US–Iran Conflict: सीजफायर को लेकर जारी बातचीत के बीच अमेरिका ने ईरान के खिलाफ एक निर्णायक और आखिरी बड़े प्रहार की रणनीति तैयार कर ली है. पेंटागन का मकसद इस कार्रवाई के जरिए युद्ध को लंबा खिंचने से रोकना है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ खुद इस प्लान को लेकर एक्टिव हैं. अमेरिका मानता है कि अगर अभी निर्णायक कदम नहीं उठाया गया, तो यह संघर्ष लंबे समय तक खिंच सकता है, जिससे वैश्विक अस्थिरता और बढ़ेगी.
आर्थिक दबाव और राजनीतिक किरकिरी
दरअसल, युद्ध लंबा खिंचने की स्थिति में अमेरिका खुद बैकफुट पर नजर आ रहा है. एक तरफ वैश्विक स्तर पर आर्थिक संकट गहराता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ ईरान में सत्ता परिवर्तन न हो पाने से अमेरिका की साख पर भी असर पड़ रहा है. यही वजह है कि अब अमेरिका तेज और निर्णायक कार्रवाई के जरिए इस टकराव को खत्म करने के मूड में है.
अहम द्वीपों पर कब्ज़े की रणनीति
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अगर सीजफायर की बातचीत फेल होती है तो अमेरिका ईरान के रणनीतिक द्वीपों जैसे खर्ग, अबू मूसा और लारक पर कब्ज़ा करने की योजना बना रहा है. खासतौर पर लारक द्वीप, जो होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर कंट्रोल के लिए बेहद अहम है, अमेरिका के टारगेट पर है. दुनिया की करीब 20% तेल सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है, ऐसे में यहां कंट्रोल का मतलब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर सीधा असर होगा.
तेल मार्गों की घेराबंदी और एयरस्ट्राइक प्लान
रणनीति में ईरानी तेल टैंकरों को रोकना, समुद्री रास्तों की घेराबंदी करना और बड़े पैमाने पर हवाई हमले शामिल हैं. साथ ही ईरान के परमाणु और ऊर्जा ठिकानों को भी निशाना बनाया जा सकता है. अमेरिका इन ठिकानों को निष्क्रिय कर ईरान की ताकत को कमजोर करना चाहता है.
जमीनी ऑपरेशन और ट्रंप की सख्त चेतावनी
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने संभावित जमीनी अभियान के लिए मिडिल ईस्ट में 1000 मरीन सैनिकों की तैनाती भी कर दी है. वहीं, डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को साफ चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर बातचीत से पीछे हटे तो उसके गंभीर परिणाम होंगे. ट्रंप ने कहा कि “अगर सीजफायर नहीं हुआ, तो फिर पीछे मुड़कर देखने का मौका नहीं मिलेगा.”
अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या बातचीत से हल निकलेगा या मिडिल ईस्ट एक और बड़े युद्ध की आग में झोंक दिया जाएगा।


