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          कैमूर का अनोखा मां मुंडेश्वरी मंदिर और रक्त विहीन बलि की परंपरा,अष्टकोणीय मंदिर में विराजमान पंचमुखी शिवलिंग और मां वाराही

          टुडे पोस्ट लाइवBy टुडे पोस्ट लाइवSeptember 30, 2025No Comments3 Mins Read
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          नवरात्र में लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं मां मुंडेश्वरी के दरबार

          Kaimur News:  बिहार के कैमूर जिले के भगवानपुर प्रखंड अंतर्गत पावरा पहाड़ी पर स्थित माता मुंडेश्वरी मंदिर अपनी अनोखी परंपराओं और प्राचीन इतिहास के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। यह मंदिर अष्टकोणीय संरचना वाला है और इसमें देवी मुंडेश्वरी के साथ महा मंडलेश्वर शिव परिवार विराजमान हैं।

          मां मुंडेश्वरी मंदिर की सबसे खास परंपरा रक्त विहीन बलि है। यहां श्रद्धालु मन्नत पूरी होने पर बकरा लाते हैं। विशेष पूजा-अर्चना के बाद बकरे को देवी के चरणों में लेटा दिया जाता है। अद्भुत यह है कि बकरा कुछ समय के लिए मूर्छित हो जाता है और पुजारी द्वारा फूल व अक्षत छिड़कते ही पुनः जीवित होकर खड़ा हो जाता है। इसके बाद श्रद्धालु उसे अपने घर ले जाते हैं। मान्यता है कि यह परंपरा भारतवर्ष में कहीं और नहीं मिलती।

          श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यहां आकर सच्चे मन से मांगी गई मनोकामनाएं जरूर पूरी होती हैं। नवरात्र के समय मंदिर में लाखों की भीड़ उमड़ती है। मंदिर के पुजारी मुन्ना द्विवेदी बताते हैं कि सालभर यहां भक्त आते हैं, लेकिन शारदीय और चैत्र नवरात्र में दर्शनार्थियों की संख्या कई गुना बढ़ जाती है।

          भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित यह मंदिर अपनी अष्टकोणीय वास्तुकला और अद्वितीय मूर्तिकला के लिए जाना जाता है। मंदिर के पूर्वी हिस्से में देवी मुंडेश्वरी की भव्य प्रतिमा स्थापित है। बीच में पंचमुखी शिवलिंग है, जो सूर्य की स्थिति के अनुसार रंग बदलता रहता है। मंदिर के पश्चिमी भाग में पूर्वाभिमुख विशाल नंदी की मूर्ति भी है, जो आज भी अक्षुण्ण अवस्था में मौजूद है।

          इतिहासकारों के अनुसार, इस मंदिर से प्राप्त शिलालेख 389 ईस्वी का है, जो इसकी प्राचीनता को प्रमाणित करता है। 1812 से 1904 के बीच ब्रिटिश यात्री आर.एन. मार्टिन, फ्रांसिस बुकानन और ब्लाक ने भी इस मंदिर का भ्रमण किया था। मंदिर की नक्काशी और मूर्तियां उत्तर गुप्तकालीन शैली की मानी जाती हैं।

          धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी दुर्गा ने चंड-मुंड राक्षसों का संहार किया था। चंड के वध के बाद मुंड इसी पहाड़ी में आकर छिप गया था। अंततः माता ने यहीं उसका वध किया और तब से देवी का यह स्थान “मां मुंडेश्वरी” के नाम से प्रसिद्ध हो गया।

          यह मंदिर मां दुर्गा के वाराही रूप को समर्पित है, जिनका वाहन महिष है। यहां बलि की सात्विक परंपरा पूरे भारत में अद्वितीय है, जहां पशु की हत्या नहीं होती बल्कि केवल रक्तविहीन बलि दी जाती है। यही कारण है कि मां मुंडेश्वरी मंदिर को श्रद्धालुओं के बीच आस्था, चमत्कार और प्राचीन विरासत का प्रतीक माना जाता है।


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