Bihar News: पटना स्थित चर्चित सरकारी आवास 10 सर्कुलर रोड को लेकर बिहार की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। राज्य सरकार द्वारा आवास का पुनः आवंटन किए जाने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि उनका परिवार किसी भी परिस्थिति में यह आवास खाली नहीं करेगा। उनके इस बयान के बाद सत्ता पक्ष और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के बीच राजनीतिक तनातनी बढ़ने के संकेत मिलने लगे हैं।
शनिवार को दिल्ली से पटना लौटने के बाद राबड़ी देवी ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि 10 सर्कुलर रोड आवास छोड़ने का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने साफ कहा कि उनका परिवार वर्षों से इस आवास में रह रहा है और इसे खाली करने की कोई योजना नहीं है। उनके इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।
10 सर्कुलर रोड आवास बिहार की राजनीति का एक महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता रहा है। पिछले करीब दो दशकों से यह आवास राजद की राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। पार्टी की कई महत्वपूर्ण बैठकें, रणनीतिक फैसले और राजनीतिक कार्यक्रम इसी परिसर से संचालित होते रहे हैं। यही कारण है कि यह आवास लालू प्रसाद यादव परिवार के लिए केवल एक सरकारी बंगला नहीं, बल्कि राजनीतिक विरासत और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक भी माना जाता है।
राजद नेताओं का कहना है कि इस आवास का पार्टी के इतिहास से गहरा संबंध रहा है। उनका मानना है कि यहां से पार्टी ने कई बड़े राजनीतिक संघर्षों का नेतृत्व किया है। इसलिए इसे खाली कराने की कोशिश को वे केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टिकोण से भी देख रहे हैं।
दरअसल, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के बाद राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया। नई सरकार के गठन के बाद विभिन्न सरकारी आवासों की समीक्षा शुरू की गई। इसी क्रम में पूर्व मुख्यमंत्रियों और अन्य नेताओं को आवंटित आवासों पर भी पुनर्विचार किया गया। इसके बाद 10 सर्कुलर रोड आवास को खाली कराने की प्रक्रिया शुरू हुई।
विवाद तब और गहरा गया जब भवन निर्माण विभाग ने 29 मई को इस आवास का आवंटन डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग के मंत्री नंदकिशोर राम के नाम कर दिया। सरकार के इस फैसले के बाद प्रशासनिक स्तर पर नए आवंटी को आवास सौंपने की तैयारी शुरू हो गई है।
हालांकि राबड़ी देवी के स्पष्ट इनकार के बाद मामला अब राजनीतिक टकराव का रूप लेता दिखाई दे रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह विवाद केवल सरकारी आवास तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्ता परिवर्तन के बाद की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और प्रतीकात्मक राजनीति का भी हिस्सा बन चुका है।


