पूर्व सांसद आनंद मोहन ने नीतीश सरकार द्वारा जारी जातिगत जनगणना के आंकड़ों पर सवाल उठाते हुए गंभीर चिंताएं जताई हैं। मुजफ्फरपुर में एक निजी कार्यक्रम के दौरान, उन्होंने राजपूतों की संख्या में हुई कमी को लेकर अपने तीखे सवाल पेश किए। आनंद मोहन ने कहा, “पिछले जनगणना के अनुसार, राजपूतों की संख्या 8 से 10 प्रतिशत थी, लेकिन वर्तमान जातिगत जनगणना में इसे केवल 3 से 4 प्रतिशत दिखाया गया है। क्या राजपूत जाति के लोग अपनी नसबंदी करवा लिए हैं? इस तरह की घटती संख्या स्पष्ट करती है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है। हमारी आबादी काफी बड़ी है, और हम अपनी जाति और आबादी के हिसाब से सांसद चुनते हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि बिहार में अब केवल जाति के आधार पर सरकार नहीं बनाई जा सकती है। हरियाणा का उदाहरण देते हुए, मोहन ने बताया कि कैसे छोटी जातियों ने मिलकर जाट उम्मीदवार को हराया। “लोग अब जाति से ऊपर उठकर वोट कर रहे हैं। यह एक सकारात्मक बदलाव है। हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि अब केवल संख्या के आधार पर राजनीति नहीं चलेगी,” उन्होंने कहा।
पूर्व सांसद ने यह भी कहा कि “जिसकी जितनी संख्या होगी, उसी का मुख्यमंत्री होगा” जैसी बातें अब पुरानी हो चुकी हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हरियाणा में कांग्रेस ने जाटों की सबसे बड़ी संख्या का दावा किया, लेकिन बीजेपी ने किसी जाति को विशेष रूप से मुख्यमंत्री के रूप में नहीं पेश किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि छोटे-छोटे जातियों के लोग एकजुट होकर बड़ी जातियों के खिलाफ वोट कर सकते हैं।
इस दौरान, उन्होंने गिरिराज सिंह की हिंदुत्व यात्रा पर भी तंज कसा। मोहन ने कहा, “यदि गिरिराज सिंह हिंदुत्व की राजनीति कर रहे हैं, तो उन्हें मुसलमानों की गलियों से यात्रा क्यों निकालनी चाहिए? ऐसे राजनीतिक खेलों से बचना चाहिए। अगर आप सच में हिंदुत्व का प्रचार करते हैं, तो अपनी यात्रा को हिंदुत्व के इलाकों से शुरू करें।”
आनंद मोहन के ये बयान आगामी बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारियों को ध्यान में रखते हुए बहुत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जातिगत राजनीति की पुरानी धारणा अब बदलने वाली है, और यह बदलाव बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ ला सकता है। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है कि क्या बिहार में जाति के आधार पर वोटिंग की पुरानी संस्कृति समाप्त होने वाली है? इस तरह के विचार व्यक्त करते हुए आनंद मोहन ने यह भी संकेत दिया कि राजनीतिक पार्टियों को अब जनता की बदलती सोच को समझना होगा। उनके विचार निश्चित रूप से आगामी चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं


