Bihar News: मोक्ष की भूमि गयाजी में विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला 25 सितंबर से शुरू होगा। 10 अक्टूबर तक चलने वाले इस मेले में देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। श्रद्धालु फल्गु नदी, विष्णुपद मंदिर और विभिन्न पिंडवेदी स्थलों पर पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण करेंगे। त्रैपाक्षिक श्राद्ध करने वाले श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक अनुष्ठान 11 अक्टूबर तक जारी रहेगा।
श्रद्धालुओं की संभावित भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन करीब 70 हजार लोगों के ठहरने की व्यवस्था कर रहा है। गांधी मैदान में 2,500 बेड की टेंट सिटी तैयार की जा रही है। इसके अलावा पर्यटन विभाग की ओर से पर्यटक सूचना केंद्र, हेल्पलाइन, प्रशिक्षित गाइड और ई-रिक्शा की सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। जीविका दीदियों की रसोई के माध्यम से श्रद्धालुओं को 25 रुपए में भरपेट भोजन उपलब्ध कराने की योजना है।
अलग-अलग तिथियों पर निर्धारित हैं पिंडदान के कर्मकांड
25 सितंबर को अनन्त चतुर्दशी के दिन पुनपुन में पिंडदान और गयापाल तीर्थपुरोहित की पांव पूजा का विधान है। 26 सितंबर को फल्गु स्नान, श्राद्ध और पांव पूजा होगी। 27 सितंबर को ब्रह्मकुंड में जौ के चूर्ण से पिंडदान के साथ प्रेतशिला, रामशिला और रामकुंड में श्राद्ध तथा काकबली में पिंडदान किया जाएगा।
28 सितंबर को पंचतीर्थ श्राद्ध के तहत उत्तरमानस, उदीची, कनखल, दक्षिणमानस और जिह्वालोल में कर्मकांड होगा। 29 सितंबर को सरस्वती स्नान, पंचरत्न दान, मातंगवापी और धर्मारण्य कूप में श्राद्ध तथा बोधगया में बोधितरू दर्शन का विधान है। 30 सितंबर को ब्रह्मसरोवर और काकबली श्राद्ध के साथ आम्रसिंचन में पिंडदान किया जाएगा।
1 अक्टूबर को रुद्रपद, ब्रह्मपद और विष्णुपद में श्राद्ध होगा। इस दिन खीर और मावा के पिंड से पिंडदान तथा गयापाल तीर्थपुरोहित की पांव पूजा होगी। 2 अक्टूबर को कार्तिकपद, दक्षिणाग्निपद और गार्हपत्याग्निपद श्राद्ध तथा 3 अक्टूबर को सूर्यपद, चंद्रपद, गणेशपद, संध्याग्निपद, आवसंध्यग्निपद और दधीचीपद में श्राद्ध किया जाएगा।
4 अक्टूबर को अष्टमी और नवमी के अवसर पर कण्वपद, मातंगपद, क्रौंचपद, अगस्त्यपद, इन्द्रपद, कश्यपपद और गजकर्णपद में श्राद्ध होगा। सीताकुंड में बालू से पिंडदान, रामगया श्राद्ध, दूध तर्पण और अन्नदान का भी विधान है।
5 अक्टूबर को गयासिर और गयाकूप में त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाएगा, जिसे पितृदोष और प्रेतदोष निवारण से जुड़ा कर्मकांड माना जाता है। 6 अक्टूबर को मुण्डपृष्ठा, आदि गदाधर और धौतपद में श्राद्ध होगा। 7 अक्टूबर को भीमगया, गौप्रचार और गदालोल श्राद्ध, जबकि 8 अक्टूबर को भगवान विष्णु का पंचामृत स्नान-पूजन और फल्गु में दुग्ध तर्पण किया जाएगा।
9 अक्टूबर को वैतरणी सरोवर पर गोदान और तर्पण तथा 10 अक्टूबर को अमावस्या के दिन अक्षयवट में श्राद्ध, खीर से पिंडदान, सुफल और पितृ विसर्जन का विधान है। त्रैपाक्षिक श्राद्ध करने वालों के लिए 11 अक्टूबर को गायत्री घाट पर दही-चावल से पिंडदान, आचार्य को दक्षिणा और पितृ विदाई का कर्मकांड होगा।
स्वच्छता और पेयजल पर भी विशेष तैयारी
मेला क्षेत्र को स्वच्छ रखने के लिए नगर क्षेत्र को पांच जोन और 54 सेक्टर में बांटा गया है। 364 स्थायी और 579 अस्थायी शौचालयों के अलावा 134 स्नानागार और 74 चेंजिंग रूम बनाए जा रहे हैं। पेयजल के लिए 280 चापाकल, 54 प्याऊ, 890 नल, 22 वाटर टैंकर और दो वाटर एटीएम की व्यवस्था रहेगी।
श्रद्धालुओं के स्वास्थ्य को लेकर 73 स्वास्थ्य शिविर लगाए जाएंगे। इनमें 125 डॉक्टर, 178 पैरामेडिकल कर्मी और 52 चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी तैनात किए जाएंगे। आवागमन को सुगम बनाने के लिए 50 रिंग बस और 150 ई-रिक्शा निशुल्क चलाने की तैयारी है। बुजुर्ग और दिव्यांग श्रद्धालुओं की मदद के लिए स्वयंसेवक व्हीलचेयर के साथ तैनात रहेंगे।
घाटों पर एसडीआरएफ, 24 घंटे कंट्रोल रूम
प्रमुख तालाबों और घाटों पर एसडीआरएफ की टीम तैनात रहेगी। किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए 24 घंटे कंट्रोल रूम और हेल्पलाइन संचालित की जाएगी। प्रशासन का फोकस सुरक्षा, यातायात, स्वच्छता, स्वास्थ्य और श्रद्धालुओं की सुविधा को एक साथ बेहतर बनाने पर है।
मोक्षधाम के रूप में गयाजी की विशेष मान्यता
धार्मिक मान्यता के अनुसार, गयाजी में पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण करने से पितरों का उद्धार होता है और पितृदोष से मुक्ति मिलती है। गयाजी को मोक्षधाम माना जाता है। विष्णुपद मंदिर में भगवान विष्णु के चरणचिह्न प्रतिष्ठित हैं। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने गयासुर नामक असुर पर अपना दाहिना चरण रखा था। यही कारण है कि पितृपक्ष के दौरान गयाजी में पिंडदान को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है।
देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए पितृपक्ष केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है। इस वर्ष प्रशासन का लक्ष्य मेले की विशालता के अनुरूप श्रद्धालुओं को सुरक्षित, स्वच्छ और सुगम वातावरण उपलब्ध कराना है।


