Nawada News: नवादा जिले के रजौली में एक ऐसी ऐतिहासिक धरोहर मौजूद है, जिसे स्थानीय परंपरा गुरु नानक देव जी की यात्रा से जोड़ती है। कभी यहां संतों की पंगत लगती थी, श्रद्धालुओं की आवाजाही रहती थी और धार्मिक गतिविधियां होती थीं। लेकिन आज यही ऐतिहासिक रजौली संगत बदहाली और उपेक्षा की मार झेल रही है। जर्जर होते भवन, वीरान परिसर और लगातार घटती संपत्ति इस ऐतिहासिक धरोहर के अस्तित्व पर सवाल खड़े कर रहे हैं। आखिर क्यों खंडहर में तब्दील हो रही है रजौली की यह ऐतिहासिक संगत? देखिए हमारी खास ग्राउंड रिपोर्ट।
तस्वीरों में दिखाई दे रही यह इमारत किसी आम पुराने भवन की नहीं, बल्कि नवादा के रजौली की ऐतिहासिक नानकशाही उदासी संगत है। स्थानीय परंपरा के अनुसार इसका संबंध सिख धर्म के प्रथम गुरु श्री गुरु नानक देव जी की बिहार यात्रा से रहा है। कहा जाता है कि गुरु नानक देव जी जब पूरब की यात्रा पर निकले थे, तब वे रजौली पहुंचे और इसी स्थान पर लोगों के बीच अपनी वाणी और उपदेश रखे। जिस स्थान पर उनके बैठकर प्रवचन देने की मान्यता है, उसे आज भी ‘गद्दी’ कहा जाता है।
संगत के वर्तमान महंत भोला बख्शदास के अनुसार स्थानीय परंपरा में वर्ष 1506 ई. में गुरु नानक देव जी के रजौली आने का उल्लेख मिलता है। उनके मुताबिक उस समय गुरु नानक देव जी के साथ उनके बड़े पुत्र श्रीचंद भी थे और इसी दौर में संगत की स्थापना से जुड़ी परंपरा मिलती है। हालांकि गुरु नानक देव जी के रजौली आगमन और वर्ष 1506 से जुड़े इन विवरणों को स्थानीय धार्मिक परंपरा के रूप में देखा जाता है। इनके ऐतिहासिक सत्यापन के लिए प्रमाणिक अभिलेखों और शोध की आवश्यकता है।
कभी करीब 150 एकड़ में फैली बताई जाने वाली इस संगत की संपत्ति अब काफी कम रह गई है। संगत से जुड़ी परंपरा के अनुसार इसकी शाखाएं नवादा के अकबरपुर, नालंदा के राजगीर और झारखंड के देवघर तक थीं। लेकिन समय के साथ हालात बदलते गए। जमींदारी प्रथा समाप्त होने के बाद संगत की आय के साधन कम होते गए और धीरे-धीरे इसके रखरखाव की समस्या बढ़ती चली गई।
महंत भोला बख्शदास:
“जमींदारी खत्म होने के बाद संगत की जमीन से आमदनी मिलनी बंद हो गई। इसके बाद इसकी देखभाल में परेशानी होने लगी। प्रशासन की ओर से भी अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। मैं वर्ष 2009 से महंत हूं और तब से गुरुग्रंथ की पूजा-अर्चना कर रहा हूं।”
महंत के अनुसार इस ऐतिहासिक परिसर में करीब 50 कमरे और तीन आंगन हैं। कभी यहां महंतों की पंगत लगा करती थी। धार्मिक आयोजन होते थे और श्रद्धालु यहां पहुंचते थे। लेकिन आज कई हिस्से जर्जर हो चुके हैं। दीवारों पर समय के निशान साफ दिखाई देते हैं। परिसर में पसरा सन्नाटा इस बात की गवाही देता है कि कभी यहां कैसी चहल-पहल रही होगी।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्थानीय लोगों के लिए यह केवल एक पुरानी इमारत नहीं है। यह गुरु नानक देव जी की स्मृतियों से जुड़ा धार्मिक स्थल है।
यही वजह है कि स्थानीय लोग चाहते हैं कि रजौली संगत को संरक्षित किया जाए, भवन का जीर्णोद्धार हो और यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक सुविधाएं विकसित की जाएं। महंत का कहना है कि प्रकाश पर्व के अवसर पर सिख धर्म से जुड़े स्थलों को गुरु नानक देव सर्किट से जोड़ने की बात कही गई थी। उनका मानना है कि यदि रजौली संगत को भी धार्मिक पर्यटन से जोड़ा जाता है तो यह स्थान सिख श्रद्धालुओं के साथ-साथ पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन सकता है।
रजौली संगत की कहानी सिर्फ एक पुराने भवन के खंडहर में बदलने की कहानी नहीं है। यह उस इतिहास को बचाने की पुकार है, जिसे स्थानीय लोग पीढ़ियों से संजोते आ रहे हैं। जरूरत है कि संगत के इतिहास का प्रमाणिक दस्तावेजीकरण हो, भवन और बची हुई संपत्ति का संरक्षण किया जाए और इसे धार्मिक एवं ऐतिहासिक पर्यटन की संभावनाओं से जोड़ा जाए।


