Patna News:- बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) ने अपने अधिकांश उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दी है। अब तक जारी 183 उम्मीदवारों की सूची में एक भी मुस्लिम चेहरा शामिल नहीं है। इससे यह साफ झलकता है कि राजग के घटक दल इस बार भाजपा के जातीय समीकरण वाले फार्मूले पर ही चल पड़े हैं।
भाजपा ने अपने कोटे की 101 सीटों पर प्रत्याशियों की घोषणा की है। पहले चरण में 71, दूसरे में 12 और फिर देर रात शेष 18 उम्मीदवारों की सूची जारी की गई। इसी तरह जदयू ने 57 सीटों, लोजपा-आर ने 15 सीटों, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) ने 6 सीटों और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएम ने 4 सीटों पर प्रत्याशियों का ऐलान किया है। लेकिन इनमें से किसी भी दल ने किसी अल्पसंख्यक उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है।
भाजपा की सूची में सवर्ण जातियों — राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण और वैश्य वर्ग — को प्राथमिकता दी गई है। वहीं यादव समुदाय के कई नेताओं के टिकट काट दिए गए हैं। यहां तक कि बिहार विधानसभा अध्यक्ष नंद किशोर यादव को भी टिकट नहीं मिला। हालांकि दानापुर सीट से पूर्व केंद्रीय मंत्री रामकृपाल यादव को प्रत्याशी बनाकर पार्टी ने यादव समाज को संदेश देने की कोशिश की है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा और जदयू दोनों ही दल इस बार अति पिछड़े वर्ग (EBC) के मतदाताओं पर भरोसा कर रहे हैं। यह वर्ग बिहार में लगभग 36 प्रतिशत वोट शेयर रखता है और चुनावी रूप से निर्णायक भूमिका निभाता है। भाजपा को विश्वास है कि सवर्ण उम्मीदवारों को इस वर्ग का समर्थन मिलेगा, जैसा कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में हुआ था।
जदयू की सूची अपेक्षाकृत मिश्रित जरूर है, लेकिन उसने भी मुस्लिम और यादव उम्मीदवारों को सीमित जगह दी है। यहां तक कि बीपी मंडल के पौत्र का टिकट भी काट दिया गया। राजनीतिक रूप से यह संकेत है कि एनडीए इस बार अति पिछड़ा वर्ग बनाम मुस्लिम-यादव समीकरण की नई रणनीति पर चुनाव लड़ रहा है।

