दुलारचंद यादव हत्याकांड से गरमाई बिहार की सियासत
तेजस्वी यादव के लिए जंगलराज की छवि बन रही बड़ी चुनौती
Patna News: बिहार विधानसभा चुनाव में एक बार फिर ‘जंगलराज बनाम सुशासन’ का मुद्दा सियासी बहस के केंद्र में आ गया है। मोकामा में बाहुबली दुलारचंद यादव की हत्या के बाद एनडीए और महागठबंधन दोनों ही इस मुद्दे को अपने-अपने अंदाज में भुनाने में जुटे हैं।
भाजपा और एनडीए ‘सुशासन बनाम जंगलराज’ के पुराने राजनीतिक एजेंडे पर दोबारा सक्रिय हो गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत एनडीए के बड़े नेता लगातार राजद पर निशाना साधते हुए बिहार को ‘जंगलराज’ से मुक्त रखने की अपील कर रहे हैं। वहीं, दुलारचंद यादव हत्याकांड के बाद महागठबंधन ने भी पलटवार करते हुए सुशासन पर सवाल उठाए हैं।
‘जंगलराज’ शब्द बिहार की राजनीति में पहली बार 1997 में गूंजा था, जब लालू प्रसाद यादव के इस्तीफे के बाद राबड़ी देवी ने मुख्यमंत्री पद संभाला। उस दौरान पटना हाईकोर्ट ने खराब प्रशासन पर टिप्पणी की थी कि “पटना की स्थिति जंगलराज से भी बदतर है।” इसके बाद यह शब्द विपक्ष का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बन गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लालू-राबड़ी शासनकाल में राजनीति का अपराधीकरण, फिरौती के लिए अपहरण और जातीय हत्याएं आम बात बन गई थीं। 1994 से 2000 के बीच करीब 337 सामूहिक हत्याओं के मामले दर्ज हुए। उस दौर की भयावह कहानियां आज भी बिहार की राजनीति पर असर डालती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि 18 से 29 वर्ष के करीब 1.77 करोड़ युवा मतदाता, जो उस दौर में पैदा भी नहीं हुए थे, फिर भी “जंगलराज” की कहानियां सुनते बड़े हुए हैं। यही वजह है कि तेजस्वी यादव के लिए अपनी पार्टी की छवि सुधारना अभी भी बड़ी चुनौती है।
पहले चरण के मतदान में अब सिर्फ चार दिन बचे हैं। एनडीए और महागठबंधन, दोनों ही अपनी रैलियों में जंगलराज बनाम सुशासन को मुख्य चुनावी हथियार बनाकर जनता को रिझाने की पूरी कोशिश में हैं।

