Chatra/Palamu News: 1857 का स्वतंत्रता संग्राम सिर्फ मेरठ, दिल्ली और कानपुर तक सीमित नहीं था। झारखंड की धरती पर भी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह हुआ था। इस संघर्ष में सूबेदार जय मंगल पांडेय और सूबेदार नादिर अली की भूमिका महत्वपूर्ण रही। दोनों ने अंग्रेजी सेना में रहते हुए ही विद्रोह का रास्ता चुना और अंततः चतरा की धरती पर शहीद हुए।
ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार जय मंगल पांडेय का जन्म 1793 में हजारीबाग के खिरगांव में हुआ था। वर्ष 1818 में वे ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में शामिल हुए और डोरंडा बटालियन में सूबेदार बने। भारतीय सैनिकों के साथ भेदभाव और अंग्रेजी शासन की नीतियों से उनमें असंतोष बढ़ता गया। 1857 के विद्रोह के दौरान उन्होंने नादिर अली समेत अन्य क्रांतिकारियों के साथ अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ मोर्चा संभाला।

डोरंडा छावनी से निकली क्रांतिकारी टुकड़ी का उद्देश्य अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष को व्यापक बनाना था। इस दौरान ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव, पांडेय गणपत राय, शेख भिखारी, उमराव सिंह तथा पलामू के नीलांबर-पीतांबर जैसे क्रांतिकारियों के संघर्ष का भी उल्लेख मिलता है। जय मंगल पांडेय और नादिर अली के नेतृत्व में क्रांतिकारी चतरा पहुंचे, जहां 2 अक्टूबर 1857 को अंग्रेजी सेना के साथ भीषण संघर्ष हुआ।
लड़ाई के बाद जय मंगल पांडेय और नादिर अली को गिरफ्तार कर लिया गया। 4 अक्टूबर 1857 को दोनों को हरजीवन तालाब के समीप फांसी दी गई। आज यह स्थान फांसी तालाब के नाम से जाना जाता है। स्थानीय लोक स्मृति में आज भी दोनों शहीदों की वीरता को गीतों के माध्यम से याद किया जाता है।
जय मंगल पांडेय की पारिवारिक विरासत पलामू के नीलांबर-पीतांबरपुर प्रखंड के राजोगाड़ी से भी जुड़ी बताई जाती है। परिवार के अनुसार राजोगाड़ी उनका ससुराल था। सातवीं पीढ़ी के वंशज सच्चिदानंद पांडेय सहित अन्य परिजन आज भी अपने पूर्वज की विरासत और शहादत को संरक्षित करने की मांग उठा रहे हैं।
परिजनों का कहना है कि जय मंगल पांडेय की जीवनी को झारखंड सरकार की कक्षा आठ की इतिहास की पाठ्यपुस्तक में स्थान मिला है, लेकिन शहीद परिवार को अपेक्षित सम्मान नहीं मिला। उनकी मांग है कि खिरगांव, डोरंडा, चतरा और राजोगाड़ी से जुड़ी ऐतिहासिक कड़ियों का दस्तावेजीकरण कराया जाए।
वंशजों ने चतरा के फांसी तालाब के संरक्षण, शहीद परिवार को सरकारी कार्यक्रमों में सम्मानपूर्वक आमंत्रित करने और जय मंगल पांडेय की स्मृति में ठोस संरक्षण कार्य कराने की मांग की है। परिवार का कहना है कि शहादत को केवल माल्यार्पण तक सीमित रखने के बजाय इतिहास और स्मारकों के संरक्षण के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाना चाहिए।


