Patna News: बिहार की बाढ़ कोई नई त्रासदी नहीं है। खासकर उत्तर बिहार के लोग दशकों से हर साल बाढ़ की विभीषिका झेलते आ रहे हैं। बारिश नेपाल या हिमालयी क्षेत्र में हो, उसका असर बिहार की नदियों और गांवों में दिखाई देता है। नदियों का जलस्तर बढ़ते ही गांवों में पानी घुसता है, सड़कें और पुल क्षतिग्रस्त होते हैं, फसलें बर्बाद होती हैं और हजारों परिवारों को सुरक्षित स्थानों या राहत शिविरों की ओर जाना पड़ता है।
दशकों पहले भी बिहार में बाढ़ के स्थायी समाधान की जरूरत महसूस की गई थी। लेकिन कई सरकारों के आने-जाने के बावजूद यह समस्या आज भी बनी हुई है। सवाल यह है कि आखिर बिहार कब तक हर साल बाढ़ का इंतजार करेगा और कब तक राहत एवं बचाव के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च होते रहेंगे?
बाढ़ आने से पहले प्रशासन सक्रिय हो जाता है। तटबंधों की मरम्मत, बालू की बोरियों की व्यवस्था, संवेदनशील इलाकों में निगरानी और राहत सामग्री की तैयारी शुरू हो जाती है। ये कदम जरूरी हैं, लेकिन इनका उद्देश्य मुख्य रूप से तत्काल संकट से निपटना होता है। कई बार तेज बहाव के सामने ये अस्थायी उपाय नाकाफी साबित होते हैं और अगले वर्ष वही प्रक्रिया फिर शुरू हो जाती है।
राहत के साथ स्थायी समाधान जरूरी
बाढ़ राहत और बचाव पर खर्च होने वाला पैसा जनता के टैक्स से आता है। इसलिए यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या हर साल तटबंधों की मरम्मत और राहत सामग्री पर खर्च करने से समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है?
जरूरत ऐसी नीति की है जो बाढ़ आने के बाद राहत पहुंचाने के साथ-साथ बाढ़ के संभावित नुकसान को पहले से कम करे। जिन गांवों में हर साल बाढ़ का खतरा बना रहता है, वहां दीर्घकालीन पुनर्वास योजना पर विचार किया जाना चाहिए। सुरक्षित और ऊंचे स्थानों पर योजनाबद्ध आवासीय बस्तियां विकसित कर लोगों को सड़क, विद्यालय, स्वास्थ्य केंद्र, बिजली, पेयजल और रोजगार जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं।
साथ ही नदी के प्राकृतिक प्रवाह और जल निकासी के रास्तों को समझना होगा। नदियों के बाढ़ क्षेत्र में अनियोजित निर्माण और प्राकृतिक जलमार्गों के अवरुद्ध होने से समस्या और गंभीर हो सकती है। इसलिए नदी प्रबंधन में जलग्रहण क्षेत्र, गाद प्रबंधन, तटबंध, जल निकासी, नदी की धारा और बाढ़ के मैदान को एक साथ ध्यान में रखना जरूरी है।
भारत-नेपाल समन्वय को मिले नई दिशा
बिहार की बाढ़ की समस्या का समाधान केवल राज्य सरकार के स्तर पर संभव नहीं है। नेपाल और हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली भारी बारिश, भूस्खलन और अचानक बढ़ने वाला जलप्रवाह बिहार की नदियों को प्रभावित करता है।
भारत और नेपाल के बीच बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली को और मजबूत करने की जरूरत है। दोनों देशों के विशेषज्ञों की संयुक्त समितियां बनाकर नदी घाटियों का वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए। केवल बाढ़ आने के बाद बैठक करने के बजाय पूरे वर्ष निगरानी और डेटा साझा करने की व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।
दशकों से जारी है बाढ़ का संकट
1978, 1993, 2008, 2017, 2025 और 2026 जैसी विभिन्न प्राकृतिक आपदाओं के दौरान बिहार के कई हिस्सों में बाढ़ का संकट सामने आया। हर बड़ी आपदा के बाद तैयारियों की समीक्षा होती है, लेकिन कुछ समय बाद व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौटती दिखाई देती है।
पश्चिम चंपारण के बगहा और आसपास के क्षेत्रों से लेकर बेतिया, गोपालगंज, सीतामढ़ी, शिवहर, वैशाली और मुजफ्फरपुर तक उत्तर बिहार के बड़े हिस्से को बाढ़ के खतरे का सामना करना पड़ता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ इलाके भी नदियों के बढ़ते जलस्तर से प्रभावित होते हैं। इन क्षेत्रों के लिए बाढ़ अब केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि हर साल लौटने वाला संकट बन चुकी है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चुनौती
जलवायु परिवर्तन ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। हिमालय में तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव तथा ग्लेशियरों और हिमनद झीलों से जुड़े जोखिम भविष्य के लिए चिंता बढ़ाते हैं। ऐसे में केवल पारंपरिक बाढ़ प्रबंधन व्यवस्था पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा।
25-30 साल की योजना बने
अब बिहार को केंद्र सरकार के सहयोग से बाढ़ नियंत्रण की दीर्घकालीन योजना बनानी चाहिए। लक्ष्य केवल अगले मानसून तक तटबंधों को बचाना नहीं, बल्कि अगले 25-30 वर्षों में बाढ़ के जोखिम और उससे होने वाले नुकसान को लगातार कम करना होना चाहिए।
इस योजना में नदी घाटी का वैज्ञानिक अध्ययन, तटबंधों का सुदृढ़ीकरण, जल निकासी व्यवस्था, संवेदनशील आबादी का पुनर्वास, बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली, भारत-नेपाल समन्वय, आपदा प्रशिक्षण और वित्तीय पारदर्शिता को शामिल किया जाना चाहिए।
बिहार को हर साल बाढ़ आने के बाद राहत बांटने वाला राज्य नहीं, बल्कि बाढ़ आने से पहले जोखिम कम करने वाला राज्य बनना होगा। बाढ़ को पूरी तरह रोकना शायद संभव नहीं है, लेकिन बाढ़ से होने वाली तबाही को कम करना निश्चित रूप से संभव है।
गरीब और आम जनता हर साल घर, फसल, पशु और रोजगार खोकर सहायता की प्रतीक्षा करती है। सरकार राहत पहुंचाती है और करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन यदि अगला मानसून फिर वही संकट लेकर आता है तो इस व्यवस्था पर पुनर्विचार जरूरी है।
अब बिहार को राहत की राजनीति से आगे बढ़कर स्थायी समाधान की नीति अपनानी होगी। जनता के टैक्स के पैसे का इस्तेमाल केवल आपदा के बाद नुकसान की भरपाई में नहीं, बल्कि ऐसी मजबूत व्यवस्था बनाने में होना चाहिए जिससे नुकसान की संभावना ही कम हो।
डाॅ. अरविंद नाथ तिवारी


