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          आपातकाल विरोधी आंदोलन भारतीय लोकतंत्र का स्वर्णिम अध्याय : रामबहादुर राय

          टुडे पोस्ट लाइवBy टुडे पोस्ट लाइवJune 24, 2026Updated:June 24, 2026No Comments3 Mins Read
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          आपातकाल विरोधी संघर्ष लोकतंत्र की दूसरी आजादी की लड़ाई था : रामबहादुर राय

          Patna News:   वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष पद्मश्री रामबहादुर राय ने कहा है कि वर्ष 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन जहां देश की राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए निर्णायक संघर्ष था, वहीं 1975 से 1977 के बीच चला आपातकाल विरोधी आंदोलन भारतीय लोकतंत्र की दूसरी आजादी की लड़ाई के रूप में याद किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि 1947 में देश को विदेशी शासन से मुक्ति मिली थी, जबकि 1977 में लोकतंत्र को तानाशाही प्रवृत्तियों से मुक्त कराया गया था।

          हिन्दुस्थान समाचार समूह की ओर से पटना के मीठापुर इंस्टीट्यूशनल एरिया में आयोजित ‘आपातकाल के 50 साल : बिहार आंदोलन और आपातकाल’ विषयक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए रामबहादुर राय ने कहा कि बिहार आंदोलन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। उन्होंने कहा कि इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि लोकनायक जयप्रकाश नारायण का सक्रिय राजनीति में पुनरागमन था। वर्ष 1955 के बाद जेपी सक्रिय राजनीति से दूर होकर भूदान आंदोलन और सामाजिक कार्यों में जुट गए थे, लेकिन 1974 में उन्होंने बिहार आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार कर छात्र आंदोलन को राष्ट्रीय जनआंदोलन में बदल दिया।

          रामबहादुर राय ने कहा कि बिहार आंदोलन को केवल भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के रूप में देखना उसकी व्यापकता को कम करके आंकना होगा। इसका मूल उद्देश्य ‘संपूर्ण क्रांति’ के माध्यम से व्यवस्था परिवर्तन था। जेपी केवल सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि राजनीतिक संस्कृति, शासन व्यवस्था और सामाजिक ढांचे में व्यापक सुधार चाहते थे। उन्होंने कहा कि जेपी का चिंतन दूरदर्शी था और वे लंबे समय से प्रशासनिक एवं संवैधानिक सुधारों की आवश्यकता महसूस कर रहे थे।

          आपातकाल की पृष्ठभूमि पर चर्चा करते हुए राय ने कहा कि यह धारणा पूरी तरह सही नहीं है कि दिल्ली के रामलीला मैदान में जयप्रकाश नारायण के भाषण के कारण आपातकाल लागू किया गया। उन्होंने बताया कि 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित किए जाने के बाद उत्पन्न राजनीतिक परिस्थितियों ने आपातकाल की राह तैयार की। सत्ता में बने रहने की इच्छा और राजनीतिक संकट की आशंका इसके प्रमुख कारणों में शामिल थे।

          उन्होंने कहा कि आपातकाल को समझने के लिए शाह आयोग की रिपोर्ट सबसे विश्वसनीय दस्तावेज है। इस रिपोर्ट में लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक अधिकारों और संवैधानिक प्रक्रियाओं पर पड़े प्रभाव का विस्तृत उल्लेख किया गया है। राय ने बताया कि आपातकाल के दौरान हजारों लोकतंत्र समर्थक कार्यकर्ताओं ने जेल यात्राएं कीं और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए संघर्ष किया।

          उन्होंने कहा कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहब देवरस ने लोकतंत्र समर्थक शक्तियों को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह संघर्ष केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं था, बल्कि छात्रों, युवाओं, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों का व्यापक जनआंदोलन बन गया था।

          रामबहादुर राय ने कहा कि जनवरी 1977 में चुनाव की घोषणा के बाद जनता ने अपने मताधिकार के माध्यम से आपातकाल के खिलाफ स्पष्ट संदेश दिया। चुनाव परिणामों ने लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया और यह साबित किया कि भारतीय समाज लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक व्यवस्था के प्रति गहरी आस्था रखता है। यही कारण है कि 1975-77 का संघर्ष भारतीय लोकतंत्र की दूसरी आजादी की लड़ाई के रूप में इतिहास में दर्ज है।

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