बिहार में मोदी–नीतीश ने तोड़ा जातीय गणित
Patna News: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 ने एक बार फिर साबित कर दिया कि राज्य की राजनीति अब पुरानी जातिगत रेखाओं पर नहीं चलती। इस चुनाव में मतदाताओं ने साफ दिखा दिया कि वे सिर्फ वादों से नहीं, काम और सुशासन से प्रभावित होते हैं। परिणामों ने तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन को जहां बड़ा झटका दिया, वहीं एनडीए को उम्मीद से कहीं अधिक जनसमर्थन मिला है।
बिहार की चुनावी सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि इस बार बिहार में एनडीए को ऐतिहासिक जीत मिलेगी, वहीं अमित शाह ने 160 सीटों का अनुमान जताया था, लेकिन जनता ने उससे भी बड़ा बहुमत देकर मोदी–नीतीश की जोड़ी पर अपने भरोसे को और मजबूत कर दिया। हैरानी की बात यह रही कि तेजस्वी यादव न तो अपने परंपरागत यादव वोटरों को पूरी तरह साध पाए और न ही मुस्लिम मतदाता एकमुश्त उनके पक्ष में आए। मतदाताओं के मन में यह भय लगातार बना रहा कि कहीं प्रदेश एक बार फिर पुराने ‘जंगलराज’ जैसी अराजकता की ओर न बढ़ जाए।
तेजस्वी का हर घर सरकारी नौकरी का वादा भी उलटा पड़ा। विशेषज्ञों का मानना है कि नौकरी योजना की आर्थिक वास्तविकता मतदाताओं को साफ समझ आ गई, और यह वादा व्यवहारिक से ज्यादा चुनावी पैंतरा लगने लगा।दूसरी ओर, कांग्रेस पहले ही चरणों से चुनावी दौड़ में कमजोर पड़ गई। कई सीटों पर मुकाबला बनने से पहले ही वह मैदान से बाहर हो गई, जिससे महागठबंधन की पूरी रणनीति लड़खड़ा गई।
एनडीए की जीत के पीछे सबसे बड़ा कारण रहा—सरकार की योजनाओं का सीधा असर। मुफ्त राशन, पेंशन, पीएम आवास योजना, नए हाईवे और खासकर महिला रोजगार योजना में सीधे खातों में डाले गए 10,000 रुपये ने बड़ी संख्या में महिला मतदाताओं को एनडीए की ओर मोड़ा। महिलाओं के साथ पूरा परिवार उसी दिशा में गया और यही ‘वोटों की सुनामी’ बना।
नीतीश कुमार की शराबबंदी और कानून-व्यवस्था में सुधार का असर भी वोटों में दिखा। अब महिलाएं रात में भी सुरक्षित महसूस करती हैं—यह अनुभव उनके मतदान निर्णय में निर्णायक रहा। यह जनादेश बताता है कि बिहार अब सिर्फ काम को वोट देता है। सपने बेचने वालों की नहीं, काम दिखाने वालों की राजनीति को ही जनता ने चुना है।

