रणनीति के मास्टरमाइंड पीके क्यों नहीं चला पाए अपनी राजनीति?
अहंकार और दूरी बनी पीके की कमजोरी
Patna News: बिहार विधानसभा चुनाव-2025 के परिणामों ने जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर के राजनीतिक प्रयोग को पूरी तरह खारिज कर दिया है। चुनावी रणनीतियों के माहिर माने जाने वाले पीके अपनी ही बनाई राजनीति पर टिक नहीं पाए और उनकी पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। यह नतीजे साफ बताती है कि रणनीति में पारंगत होना और जनता के नेता बन जाना, दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रशांत किशोर नेतृत्व की बुनियादी कसौटियों पर खरे नहीं उतर सके। करोड़ों रुपये लेकर बड़ी पार्टियों को विजय दिलाने वाले पीके खुद जनता का विश्वास हासिल नहीं कर पाए। विश्लेषकों का कहना है कि 2030 तक भी जन सुराज की जमीन मजबूत होती नहीं दिख रही, क्योंकि नेतृत्व का जो मानवीय स्पर्श होना चाहिए, वह पीके के व्यवहार और शैली में नहीं झलकता।
चुनाव अभियान के दौरान कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और आम लोगों के बीच एक ही बात बार-बार सुनने को मिली—प्रशांत किशोर का व्यवहार अहंकारी और कटु है। जनता से दूरी, ऊंचाई का भाव और तीखे जवाब उनकी राजनीति को भीतर से कमजोर करते रहे। बिहार की राजनीति में नेता तभी स्वीकार होता है, जब वह जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले, न कि सिर पर चढ़कर।
प्रशांत किशोर की एक और बड़ी भूल यह मानी जा रही है कि उन्होंने यह समझ लिया कि पार्टी में आने वाला हर व्यक्ति उनकी तरह ईमानदार और अनुशासित होगा। भारतीय राजनीति का यह सबसे बड़ा भ्रम है। यहां आदर्शों से ज्यादा व्यवहारिकता चलती है। यही कारण है कि कई ईमानदार लोग नेता नहीं बन पाते, बल्कि सलाहकार की भूमिका में ही सीमित रह जाते हैं।
बिहार की सियासी गलियों में अक्सर कहा जाता है कि “राजनीति में गधे को भी बाप बनाना पड़ता है” — यानी हर स्तर के लोगों से तालमेल बैठाना सीखना पड़ता है। पीके इस कला में पिछड़ गए। अब प्रशांत किशोर के सामने दो ही रास्ते हैं—या तो बिहार की राजनीति में टिककर संघर्ष से सीखें, अहंकार छोड़ें, या मान लें कि राजनीति उनके स्वभाव और शैली के अनुरूप नहीं है।

