Darbhanga News: मिथिला की धार्मिक परंपराओं में नवादा गांव स्थित हयहट्ट देवी मंदिर का विशेष स्थान है। बेनीपुर अनुमंडल के इस प्राचीन सिद्धपीठ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां देवी की प्रतिमा के बजाय उनके सिंहासन की पूजा-अर्चना की जाती है। स्थानीय मान्यता है कि सच्चे मन से मां के दरबार में प्रार्थना करने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यही वजह है कि शारदीय नवरात्र में यहां दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
पुजारी के आग्रह पर गांव पहुंचीं देवी
स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, बहेड़ी प्रखंड के हावीडीह गांव के एक पुजारी प्रतिदिन कमला नदी पार कर नवादा स्थित मंदिर में पूजा करने आते थे। वृद्धावस्था में जब उनके लिए रोज नदी पार करना कठिन हो गया, तो उन्होंने देवी से अपने गांव में विराजमान होने की प्रार्थना की। मान्यता है कि देवी अपने भक्त के आग्रह पर हावीडीह चली गईं।

इसके बाद मंदिर के प्रथम पुजारी स्वर्गीय दामोदर ठाकुर को स्वप्न में देवी ने दर्शन देकर बताया कि वह अपनी इच्छा से वहां गई हैं। साथ ही, उन्होंने सिंहासन की पूजा से भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होने की बात कही। तभी से मंदिर में प्रतिमा के बजाय सिंहासन पूजन की परंपरा चली आ रही है।
अष्टमी को 56 भोग, नवमी को छागर बलि
नवरात्र के दौरान मंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। अष्टमी की रात निशा पूजा का आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर देवी के सिंहासन को अरहुल के फूलों से सजाया जाता है और 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है।
नवमी के दिन परंपरागत रूप से छागर बलि दी जाती है। इस अनुष्ठान में पड़ोसी भगवतपुर गांव के एक सदस्य की उपस्थिति भी परंपरा का हिस्सा मानी जाती है। इन विशिष्ट धार्मिक परंपराओं के कारण मंदिर की अलग पहचान बनी हुई है।
तीन एकड़ में फैला है मंदिर परिसर
करीब तीन एकड़ में फैले मंदिर परिसर में हयहट्ट देवी मंदिर के अलावा तीन शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, राम-जानकी मंदिर और नाग मंदिर भी हैं। श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए धर्मशालाओं और आश्रमों की व्यवस्था है।
शारदीय नवरात्र के दौरान हजारों भक्तों के पहुंचने से मंदिर परिसर में चहल-पहल बढ़ जाती है। श्रद्धालुओं की भीड़ के कारण बहेड़ा-झंझारपुर मार्ग पर आवागमन भी प्रभावित होता है।
मंदिर के पुजारी अमरनाथ ठाकुर के अनुसार, भक्त पूरी आस्था के साथ मां के दरबार में पहुंचकर प्रार्थना करते हैं। हयहट्ट देवी मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सदियों पुरानी लोकपरंपराओं का भी महत्वपूर्ण प्रतीक है।


