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          Headline

          लेंबोईया पहाड़ी पर विराजती हैं मां दक्षिणेश्वरी भगवती,मनोकामना पूरी होने पर मां को चढ़ाते हैं सोने-चांदी के नेत्र, अनोखी है परंपरा

          झारखंड के चतरा जिले के पत्थलगडा प्रखंड में स्थित लेंबोईया पहाड़ी पर विराजमान मां दक्षिणेश्वरी भगवती का मंदिर आस्था, प्राचीन इतिहास और लोकपरंपराओं का अनूठा संगम है।
          टुडे पोस्ट लाइवBy टुडे पोस्ट लाइवOctober 19, 2026Updated:October 19, 2026No Comments5 Mins Read
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          Chatra News:  झारखंड के चतरा जिले के पत्थलगडा प्रखंड में स्थित लेंबोईया पहाड़ी पर विराजमान मां दक्षिणेश्वरी भगवती का मंदिर आस्था, प्राचीन इतिहास और लोकपरंपराओं का अनूठा संगम है। प्राकृतिक सुंदरता के बीच स्थित यह प्राचीन मंदिर लंबे समय से श्रद्धालुओं के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। नवरात्र के अवसर पर यहां मां के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से भक्त पहुंचते हैं। स्थानीय मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद मां भगवती के दरबार में पूरी होती है।

          मंदिर की पहचान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है। यहां की अनूठी पूजा-पद्धतियां, प्राचीन प्रतिमाएं, ऐतिहासिक मान्यताएं और पारंपरिक मेले इस स्थल को चतरा की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाते हैं।

          मां सती के वाम नेत्र से जुड़ी है मान्यता

          स्थानीय मान्यता के अनुसार, लेंबोईया पहाड़ी पर मां सती का वाम नेत्र गिरा था। इसी कारण इस स्थल को पवित्र और सिद्धपीठ के रूप में मान्यता प्राप्त है। मंदिर में मां भगवती चामुंडा स्वरूप में विराजमान हैं। उनकी प्रतिमा दक्षिणमुखी बताई जाती है, जिसे श्रद्धालु विशेष महत्व देते हैं।

          नवरात्र के दौरान मंदिर में भक्तों की आवाजाही बढ़ जाती है। श्रद्धालु मां के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और खुशहाली की कामना करते हैं। सालभर भी विभिन्न धार्मिक और पारिवारिक अवसरों पर यहां भक्त पहुंचते रहते हैं।

          मनोकामना पूरी होने पर चढ़ाते हैं सोने-चांदी के नेत्र

          लेंबोईया मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपराओं में मां भगवती को सोने और चांदी के नेत्र अर्पित करना शामिल है। स्थानीय विश्वास के अनुसार, मनोकामना पूरी होने पर श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार माता को नेत्र चढ़ाते हैं। वर्षों से चली आ रही यह परंपरा मंदिर को अलग पहचान देती है।

          यहां पूजा की एक और अनूठी विधि प्रचलित है। पुजारी मां भगवती के मस्तक पर फूल अर्पित कर स्तुति करते हैं। इसके बाद श्रद्धालु फूल गिरने की प्रतीक्षा करते हैं। लोकमान्यता के अनुसार, मां के मस्तक से फूल जितनी जल्दी गिरता है, मनोकामना उतनी ही जल्दी पूरी होने का संकेत माना जाता है। भक्त इसे मां की कृपा और आशीर्वाद से जोड़कर देखते हैं।

          नवमी के मेले से कार्तिक पूर्णिमा तक बदली परंपरा

          लेंबोईया मंदिर का मेला भी क्षेत्र की धार्मिक और सामाजिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्थानीय बुजुर्गों और पूर्व मुखिया बासुदेव तिवारी, गंदौरी राम दांगी तथा तीर्थनाथ दांगी सहित ग्रामीणों के अनुसार, करीब 50 वर्ष पहले तक नवरात्र की नवमी के दिन मंदिर परिसर में विशाल मेले का आयोजन होता था।

          बाद में पत्थलगडा प्रखंड मुख्यालय में दुर्गापूजा का आयोजन शुरू होने के बाद नवमी के मेले की पुरानी परंपरा बंद हो गई। इसके बाद कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर मेले का आयोजन शुरू हुआ। आज भी यह मेला श्रद्धालुओं के लिए पूजा-अर्चना के साथ आपसी मेल-मिलाप और सांस्कृतिक जुड़ाव का अवसर प्रदान करता है।

          प्राचीन प्रतिमाओं में छिपी है ऐतिहासिक विरासत

          मंदिर परिसर में मां भगवती की प्रतिमा के अलावा अन्य प्राचीन प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। स्थानीय विवरणों में इन प्रतिमाओं का संबंध पाल काल से जोड़ा जाता है। हालांकि, इनके काल निर्धारण और ऐतिहासिक महत्व की पुष्टि के लिए पुरातात्विक अध्ययन आवश्यक है।

          स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, वर्ष 1872 के सर्वेक्षण नक्शे में भी मंदिर का उल्लेख मिलता है। वहीं, मुगल काल के दौरान मंदिर को नुकसान पहुंचने की बात भी स्थानीय परंपराओं में कही जाती है। इन ऐतिहासिक दावों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए प्रमाणिक दस्तावेजों और पुरातात्विक साक्ष्यों का अध्ययन जरूरी है।

          रामगढ़ राजपरिवार से रहा है पुराना संबंध

          मंदिर के वयोवृद्ध पुजारी भोली पांडेय के अनुसार, लेंबोईया मंदिर का रामगढ़ राजपरिवार से पुराना जुड़ाव रहा है। उनके मुताबिक, रामगढ़ राजपरिवार के राजा कामाख्या नारायण सिंह मंदिर पहुंचकर यहां की व्यवस्था का जायजा लेते थे। पुजारी का कहना है कि मंदिर के पुजारी के रहन-सहन और व्यवस्था के लिए राजपरिवार की ओर से सिंघानी और लेंबोईया गांव के मौजा में जमीन दान की गई थी।

          स्थानीय परंपरा के अनुसार, मंदिर में राजपरिवार से जुड़ी कुछ धार्मिक रस्में और चढ़ावे की परंपरा आज भी प्रचलित हैं। प्रथम बलि के आह्वान में भी राजपरिवार का नाम लिया जाता है।

          भूमिहार परिवारों की कुलदेवी हैं मां भगवती

          क्षेत्र के कई भूमिहार परिवार मां भगवती को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं। मुंडन, उपनयन और विवाह जैसे मांगलिक अवसरों पर परिवार के लोग मंदिर पहुंचकर माता का आशीर्वाद लेते हैं। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले मां के दरबार में शीश नवाने की परंपरा भी प्रचलित है।

          आषाढ़ में दूध चढ़ाने की अनूठी परंपरा

          मंदिर में आषाढ़ महीने के दौरान दूध चढ़ाने की विशेष परंपरा भी निभाई जाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, सिंघानी गांव के किसान मां भगवती को दूध अर्पित करते हैं। विश्वास है कि निर्धारित बर्तन में चढ़ाया गया दूध यदि बराबर मात्रा में निकलता है, तो उस वर्ष अच्छी कृषि पैदावार होती है। यह परंपरा ग्रामीण जीवन, खेती और धार्मिक आस्था के गहरे संबंध को दर्शाती है।

          पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण

          स्थानीय जानकारी के अनुसार, लेंबोईया पहाड़ी स्थित मंदिर को राज्य सरकार ने पर्यटन स्थल के रूप में चिह्नित किया है। प्राचीन प्रतिमाओं, प्राकृतिक सुंदरता, विशिष्ट पूजा-पद्धतियों और कार्तिक पूर्णिमा के मेले के कारण इस स्थल में धार्मिक पर्यटन की अच्छी संभावनाएं हैं।

          मंदिर का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण, प्राचीन प्रतिमाओं का संरक्षण और श्रद्धालुओं के लिए पेयजल, स्वच्छता, सड़क तथा अन्य बुनियादी सुविधाओं का विकास इसकी पहचान को और व्यापक बना सकता है।

          लेंबोईया मंदिर की विशेषता इसकी प्राचीनता के साथ यहां जीवित लोकपरंपराएं भी हैं। सोने-चांदी के नेत्र अर्पित करने से लेकर फूल गिरने को मां की कृपा का संकेत मानने और कार्तिक पूर्णिमा के मेले तक, ये परंपराएं इस सिद्धपीठ को चतरा की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का विशिष्ट प्रतीक बनाती हैं।

          Lemboiya Pahadi Temple Lemboiya Temple Kartik Purnima Mela Maa Dakshineshwari Bhagwati Temple Chatra चतरा का प्राचीन सिद्धपीठ लेंबोईया पहाड़ी मां भगवती मंदिर
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