Patna News:- बिहार की राजनीति में भाजपा का उभार किसी एक चुनावी लहर का नतीजा नहीं, बल्कि चार दशक के सतत संगठन, संघर्ष और वैचारिक मजबूती का परिणाम है। 2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जो ऐतिहासिक सफलता हासिल की, उसने यह साफ कर दिया कि अब राज्य की राजनीति में भाजपा की पैठ स्थायी और बेहद प्रभावशाली है।
1980 के दशक में भाजपा की शुरुआत बिहार में बहुत सीमित प्रभाव के साथ हुई थी। कुछ सीटें और छोटा संगठन ही पार्टी की पहचान थी। लेकिन 1990 के दशक में राम आंदोलन, जनसंघ की विरासत और बदलती सामाजिक चेतना ने भाजपा को एक वैचारिक राजनीतिक शक्ति के रूप में उभारना शुरू किया। इसी दौरान पार्टी ने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत किया, जिससे धीरे-धीरे जनसमर्थन बढ़ता गया।
भाजपा के लिए असली मोड़ 2005 में आया, जब नीतीश कुमार के नेतृत्व में पहली बार राजग की सरकार बनी और भाजपा उसके प्रमुख स्तंभ के रूप में उभरी। 2005 और 2010 के चुनावों में राजग को भारी सफलता मिली, जिससे विकास और सुशासन की राजनीति ने गति पकड़ी। हालांकि 2013 में गठबंधन टूट गया, लेकिन 2017 में दोनों दल फिर एक साथ आए और सरकार का गठन हुआ। 2020 में भाजपा 74 सीटें जीतकर राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बन गई।
2022 में एक बार फिर राजनीतिक समीकरण बदले और भाजपा विपक्ष में आ गई, लेकिन इस दौरान पार्टी ने अपने बूथ संगठन और जनसंपर्क को और मजबूत किया। यही कारण है कि 2025 के चुनाव में भाजपा-राजग ने अभूतपूर्व जनादेश हासिल कर सत्ता की मुख्य धुरी बन गई।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भाजपा की मजबूती के पीछे कई कारण हैं—पिछड़ों और अति पिछड़ों में बढ़ती स्वीकार्यता, महिला वोटरों में गहरी पैठ, युवा वर्ग में राष्ट्रवाद और रोजगार की अपील, और हर बूथ पर सक्रिय संगठनात्मक नेटवर्क। बिहार के 2025 के जनादेश ने यह साबित कर दिया है कि भाजपा अब राज्य की राजनीति की निर्णायक शक्ति बन चुकी है।

