Ramgarh News: झारखंड के प्रसिद्ध सिद्धिपीठ रजरप्पा स्थित मां छिन्नमस्तिका मंदिर में अमावस्या की रात विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी। इस अवसर पर मंदिर परिसर में हवन, मंत्र जाप, धार्मिक अनुष्ठान और रात्रि जागरण का आयोजन होगा। मां भगवती के दर्शन और पूजा के लिए झारखंड समेत देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालुओं और साधकों के पहुंचने की परंपरा रही है। अमावस्या की रात मुख्य मंदिर के साथ परिसर स्थित मां दक्षिणेश्वरी काली मंदिर में भी विशेष पूजा की जाएगी।
दस महाविद्याओं में छठा स्थान
भैरवी और दामोदर नदी के पवित्र संगम पर स्थित रजरप्पा मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन तांत्रिक परंपराओं के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां छिन्नमस्तिका दस महाविद्याओं में छठी महाविद्या हैं। उनका स्वरूप त्याग, आत्मबल, परोपकार और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। अमावस्या की रात्रि को देवी उपासना, ध्यान और साधना के लिए विशेष महत्व दिया जाता है।
मंदिर के पुजारी सुभाषिष पंडा ने बताया कि अमावस्या की रात श्रद्धालु हवन, पूजन, मंत्र जाप और धार्मिक पाठ के माध्यम से मां की आराधना करते हैं। कई भक्त पूरी रात जागकर भजन-कीर्तन और माता के ध्यान में लीन रहते हैं। इस दौरान मंदिर परिसर में विशेष आध्यात्मिक वातावरण बना रहता है।
मां दक्षिणेश्वरी काली मंदिर में भी होगी पूजा
मुख्य मंदिर के अलावा परिसर के पश्चिमी छोर पर स्थित कुमुद प्रीता ट्रस्ट के मां दक्षिणेश्वरी काली मंदिर में भी अमावस्या पर विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। श्रद्धालु दीप प्रज्वलित कर मां काली की पूजा करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि तथा कल्याण की कामना करते हैं।
इस अवसर पर बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली समेत कई राज्यों से देवी उपासक और साधक रजरप्पा पहुंचते हैं।
त्याग और शक्ति का प्रतीक है मां का स्वरूप
पुजारी लोकेश पंडा के अनुसार, पौराणिक मान्यता में मां छिन्नमस्तिका ने अपनी सहचरियों की भूख मिटाने के लिए स्वयं का बलिदान किया था। इसी प्रसंग के कारण उनका स्वरूप त्याग, परोपकार और आत्मबल का प्रतीक माना जाता है। मां का यह अद्भुत स्वरूप श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र है।
प्रकृति और आस्था का संगम
रजरप्पा मंदिर धार्मिक महत्व के साथ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी प्रसिद्ध है। भैरवी-दामोदर नदी का संगम, आसपास की पहाड़ियां और प्राकृतिक झरना इस स्थल की खूबसूरती बढ़ाते हैं। अमावस्या की रात यहां पूजा-पाठ और साधना के बीच श्रद्धा एवं आध्यात्मिकता का अनूठा संगम देखने को मिलता है।


