Patna News: बिहार विधानसभा चुनाव-2025 के नतीजों ने राजनीतिक विश्लेषकों के तमाम आकलनों को गलत साबित कर दिया है। शाम सात बजे तक आए रुझानों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) 202 से अधिक सीटों पर आगे चल रहा है, जबकि महागठबंधन महज 35 सीटों पर सिमटता दिखाई दे रहा है। जनता ने इस चुनाव में स्पष्ट संदेश दिया है कि स्थिरता के लिए नीतीश कुमार और नेतृत्व के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर भरोसा कायम है।
दूसरी ओर, महागठबंधन के लिए यह चुनाव कई मोर्चों पर विफलता लेकर आया। सीट बंटवारे के समय से ही गठबंधन के भीतर अविश्वास की स्थिति नजर आई। देर से सीट शेयरिंग की घोषणा, उम्मीदवारों को लेकर मतभेद और संयुक्त प्रचार अभियान की कमी ने जमीनी स्तर पर विपक्ष की मजबूती को कमजोर कर दिया। चुनावी रैलियों से लेकर पोस्टरों तक, तीनों दलों के बीच तालमेल का अभाव साफ झलकता रहा, जिसका सीधा असर वोटों के बिखराव के रूप में दिखा।
राजद ने 144 में से 52 सीटों पर यादव उम्मीदवार उतारकर जातीय समीकरण पर अत्यधिक निर्भरता दिखाई, जिससे गैर-यादव ओबीसी, अतिपिछड़ा वर्ग और सवर्ण मतदाताओं की दूरी बढ़ी। भाजपा ने इसे “यादव राज” करार दिया और शहरी तथा मध्यम वर्ग में यह नैरेटिव गहराई तक असर कर गया।
मुख्यमंत्री पद के चेहरे तेजस्वी यादव ने बड़ी घोषणाएं तो कीं—सरकारी नौकरी, पेंशन, सामाजिक सुरक्षा जैसे वादों से शुरुआती उत्साह भी दिखा—लेकिन इन वादों को पूरा करने की ठोस योजना या वित्तीय मॉडल पेश न कर पाने से विश्वसनीयता कमजोर पड़ी। एनडीए ने इन वादों को अवास्तविक बताते हुए प्रभावी ढंग से मुद्दा उठाया और लाभ प्राप्त किया।
मुस्लिम बहुल इलाकों पर महागठबंधन का अत्यधिक फोकस और कुछ उग्र बयानों ने भाजपा को “जंगलराज” और “तुष्टीकरण” का नैरेटिव आगे बढ़ाने का मौका दिया। कई जगह यादव वोटों में भी सेंध लगी। महिलाओं और युवाओं पर जंगलराज की यादों का प्रभाव स्पष्ट दिखा, जिससे महागठबंधन पिछड़ गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि रणनीतिक चूक, पारिवारिक कलह और कमजोर समन्वय ने महागठबंधन की हार को और गहरा कर दिया।

