Khunti News:- सूर्योपासना का चार दिवसीय महापर्व छठ शनिवार से नहाय-खाय अनुष्ठान के साथ पूरे श्रद्धा और भक्ति भाव से प्रारंभ हो गया। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि मानव और प्रकृति के बीच गहरे संबंधों को दर्शाने वाला एक अनूठा लोक उत्सव भी है।
छठ महापर्व के दौरान श्रद्धालु अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देकर जीवन, ऊर्जा और संतुलन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। प्रसाद में शामिल फलों, गन्ने, ठेकुआ और मिट्टी के बर्तनों से लेकर पूजा में प्रयुक्त सूप और दौरा तक, हर चीज़ प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव जगाती है।
पूरे खूंटी जिले में छठ की तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं। तालाबों और घाटों की सफाई, सजावट और पूजन सामग्रियों की खरीदारी से बाजार गुलजार हैं। छठ गीतों और लोकधुनों से वातावरण भक्तिमय हो उठा है।
स्थानीय समाजसेवी त्रिपुरेश त्रिपाठी का कहना है कि छठ महापर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह अनुशासन, समर्पण और पर्यावरण संतुलन का प्रतीक है। वहीं सेवानिवृत्त शिक्षक देवनारायण महतो के अनुसार, सूर्य को दिया जाने वाला अर्घ्य जीवन के पुनर्जन्म, आशा और संतुलन का प्रतीक है।
तोरपा के समाजसेवी धर्मेंद्र कुमार ने बताया कि झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में यह पर्व खेतों, नदियों और पोखरों के किनारे लोकगीतों और मांदर की थाप पर मनाया जाता है। उन्होंने कहा कि हालांकि आधुनिकता और धर्मांतरण के प्रभाव से यह परंपरा धीरे-धीरे क्षीण हो रही है, लेकिन इसका सांस्कृतिक महत्व आज भी बरकरार है।
वरिष्ठ समाजसेवी शिव शंकर मिश्र का मानना है कि छठ पर्व पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है। स्वच्छता, जलस्रोतों की पवित्रता और मिट्टी के दीपों का उपयोग हमें यह सिखाता है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य ही सच्चा धर्म है।
बिकुवादाग के समाजसेवी दिलीप शर्मा ने कहा कि जब मनुष्य प्रकृति के प्रति कृतज्ञ होता है, तभी उसका जीवन सच्चे अर्थों में प्रकाशमय बनता है।

