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    Home»Headline»लालू की बनाई पार्टी अब दो लालूओं में उलझी, तेजस्वी के वादे बनाम तेज प्रताप की ललकार
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    लालू की बनाई पार्टी अब दो लालूओं में उलझी, तेजस्वी के वादे बनाम तेज प्रताप की ललकार

    today post liveBy today post liveNovember 4, 2025No Comments5 Mins Read
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    Patna News:- बिहार की सियासत में इस वक्त दो नाम सबसे ज्यादा सुर्खियों में हैं तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव। एक ही घर के, एक ही पिता के, लेकिन दो अलग-अलग झंडों के नीचे खड़े। यही वजह है कि बिहार की गलियों में लोग कहने लगे हैं कि लालू परिवार अब दो राहों पर है। लालू प्रसाद यादव का परिवार अब बिखरने की कगार पर है। तेज प्रताप यादव और तेजस्वी यादव के बीच की जंग अब नीतियों या विचारों की नहीं रही, यह अहम, ईर्ष्या और सत्ता-लालसा की लड़ाई बन चुकी है।

    महुआ से राघोपुर तक फैली भाई-भाई की जंग

    महुआ की रैली से शुरू हुई बात अब राघोपुर तक पहुंच गई है। तेजस्वी यादव ने जब मंच से कहा कि पार्टी ही सबकुछ है, पार्टी से बड़ा कोई नहीं तो यह बात तेजप्रताप को चुभ गई। उन्होंने तुरंत पलटवार किया कि पार्टी नहीं, जनता बड़ी होती है। वही असली मालिक है। इसी जवाब ने यह साफ कर दिया कि अब इस लड़ाई में ‘भावनाएं’ नहीं, बल्कि विचार और नेतृत्व का संघर्ष भी शामिल है।

    झुनझुना वाला तंज बना सियासी बम

    तेजप्रताप का यह कहना कि चुनाव के बाद तेजस्वी को झुनझुना पकड़ाऊंगा। दरअसल, सिर्फ मजाक नहीं, बल्कि सत्ता संघर्ष का खुला इशारा था। भाई पर ‘नादान’ और ‘दूधमुंहा बच्चा’ जैसे शब्द इस्तेमाल करना बताता है कि दोनों के बीच अब सम्मान की दीवार भी टूट चुकी है। राजद के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, लालू यादव ने कई बार दोनों बेटों को एक मंच पर लाने की कोशिश की, लेकिन हर बैठक तेजस्वी का धैर्य और तेजप्रताप का गुस्सा के टकराव में खत्म हो जाती है।

    परिवार की दीवारें क्यों दरक रहीं हैं?

    लालू प्रसाद यादव की सियासत हमेशा परिवारवाद के ताने-बाने में बुनी रही है। लेकिन, अब वही परिवार विचारों और महत्वाकांक्षा के द्वंद्व में उलझ गया है। तेजस्वी, जो संगठित और व्यवहारिक माने जाते हैं, आज राजद के चेहरे हैं। वहीं तेज प्रताप, जो खुद को आध्यात्मिक समाजवादी कहते हैं, अब खुद की पार्टी जनशक्ति जनता दल (जजद) के झंडे तले जनता के असली पुत्र बनने का दावा कर रहे हैं।

    हरा झंडा फर्जी बनाम जनशक्ति असली

    तेज प्रताप ने हाल ही में राघोपुर की सभा में कहा कि हरा झंडा वाला राजद फर्जी है। असली पार्टी जनशक्ति जनता दल है। यह बयान प्रतीकात्मक रूप से बड़ा है। यह लालू के बनाए हरा-लाल गठबंधन रंग को चुनौती देने जैसा है। राजनीति के जानकार इसे लालू ब्रांड की विरासत को दो हिस्सों में बंटते देखने जैसा मानते हैं।

    भाईचारे के पीछे छिपा ‘नेतृत्व का सवाल’

    राजद में तेजस्वी का कद लगातार बढ़ा है। विधानसभा में विपक्ष के नेता से लेकर मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरे तक, वे आज पार्टी की दिशा तय कर रहे हैं। वहीं तेज प्रताप बार-बार जनता की असली आवाज बनने की कोशिश में खुद को मसीहा की भूमिका में पेश करते हैं। उनकी वाणी, उनके हावभाव, यहां तक कि उनके धर्म-आध्यात्मिक प्रयोग सब अलग पहचान बनाने की कोशिश लगते हैं। एक में जोश है, दूसरे में होश। लालूजी के बाद यही फर्क अब साफ दिखाई दे रहा है।

    तेजस्वी बार-बार खुद को परिपक्व दिखाने की कोशिश में हैं। लेकिन, जनता पूछ रही है कि कितनी बार भाई की बदजुबानी पर चुप रहेंगे? उनकी चुप्पी अब परिपक्वता नहीं, कमजोरी और डर मानी जा रही है। राजद के भीतर भी आवाजें उठने लगी हैं कि तेजस्वी के नेतृत्व में अनुशासन नहीं, समझौता संस्कृति बढ़ रही है। एक पुराने कार्यकर्ता ने कहा कि लालू के जमाने में जो दुश्मन से लड़ते थे, आज भाई से डर रहे हैं।

    तेजस्वी यादव ने हर घर से एक व्यक्ति को नौकरी देने का वादा किया है। तेज प्रताप ने इसे हवाई घोषणा बताया और कहा कि ऐसे दावे सरकार बनने के बाद करने चाहिए, पहले नहीं। यानी एक भाई विकास के वादे पर चुनाव लड़ रहा है, दूसरा भाई राजनीतिक नैतिकता की दुहाई दे रहा है। लेकिन, असल सवाल यही है कि जनता किसे गंभीर मानेगी?

    लालू प्रसाद यादव की राजनीति का मूल वाक्य था- जिसके हाथ में लाठी, उसकी भैंस। आज वही लाठी दो हिस्सों में बंटती दिख रही है। परंतु राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि यह टूटन नहीं, संक्रमण है। बिहार की राजनीति अब लालू बनाम लालू के वारिस के दौर में प्रवेश कर चुकी है।

    पटना के राजद कार्यालय में अब चर्चा खुलकर होती है कि कौन तेजस्वी का आदमी है, कौन तेजप्रताप का। तेजप्रताप के समर्थक मानते हैं कि तेजस्वी ने राजद को कॉरपोरेट अंदाज में बदल दिया है, जहां भावना से ज्यादा मैनेजमेंट चलता है। वहीं तेजस्वी खेमे का तर्क है कि राजनीति जोश से नहीं, जोड़े रखने की समझ से चलती है। यानी पार्टी के भीतर अब विचार और वफादारी दोनों के आधार पर खेमेबंदी साफ दिख रही है।

    राबड़ी देवी ने कई मौकों पर कोशिश की कि दोनों भाई एक मंच पर आएं। लेकिन, अब माहौल इतना बिगड़ चुका है कि तेजस्वी के कार्यक्रमों में तेजप्रताप नजर नहीं आते और तेजप्रताप की रैलियों में तेजस्वी का नाम तक नहीं लिया जाता। लालूजी अब केवल मौन रहते हैं। यह मौन ही सबसे बड़ा संकेत है कि लालू युग का परिवार अब एक राजनीतिक घर नहीं, दो राजनीतिक पते बन चुका है।

    तेजप्रताप ने राघोपुर में अपनी रैली में दावा किया कि यहां भी जनशक्ति जनता दल की लहर है। जनता समझ चुकी है कि कौन सच्चा लालू पुत्र है। राघोपुर, जो तेजस्वी का किला माना जाता था, अब जजद और राजद कार्यकर्ताओं के बीच मौन युद्ध का केंद्र बन गया है।

    लालू यादव ने कभी कहा था कि मेरे बेटे मेरी विरासत संभालेंगे। अब वही विरासत दो झंडों में बंट चुकी है। एक हरे रंग का, दूसरा जनशक्ति का। तेजस्वी सत्ता की राजनीति कर रहे हैं तो तेजप्रताप सम्मान की राजनीति। लेकिन, दोनों की इस जंग ने बिहार की राजनीति को एक बार फिर उस मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां सवाल सिर्फ इतना रह गया है कि क्या लालू परिवार अब सचमुच टूट चुका है? या यह टूटन किसी बड़े पुनर्गठन की प्रस्तावना है?

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