महाभारत काल से जुड़ा है झारखंड का भद्रकाली सिद्धपीठ
शारदीय नवरात्र में देश-विदेश से पहुंचते हैं श्रद्धालु
Chatra News: झारखंड के चतरा जिले के इटखोरी प्रखंड में स्थित मां भद्रकाली का मंदिर तीन धर्मों की आस्था का संगम स्थल माना जाता है। महाभारत कालीन यह सिद्धपीठ ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि पांडवों ने यहां माता की आराधना की थी और दुर्गा सप्तशती में भी इस मंदिर का उल्लेख मिलता है।
भदुली नगर, जिसे अब इटखोरी कहा जाता है, महाने और बक्सा नदी के संगम तट पर बसा है। सनातन धर्म के लिए यह स्थल माता भद्रकाली का पवित्र धाम है, वहीं बौद्ध धर्म में इसे भगवान बुद्ध की साधना स्थली और जैन धर्म में दसवें तीर्थंकर भगवान शीतलनाथ की जन्मभूमि माना जाता है। यही कारण है कि यह स्थल तीनों धर्मों के लिए आस्था का केंद्र है।
इतिहासकारों के अनुसार 9वीं शताब्दी में बंगाल के शासक राजा महेंद्र पाल ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर में स्थापित माता भद्रकाली की करीब 5 फीट ऊंची चतुर्भुज प्रतिमा दुर्लभ काले पत्थर को तराशकर बनाई गई है। प्रतिमा के चरणों के नीचे ब्राह्मी लिपि में श्लोक भी अंकित हैं। मंदिर परिसर में एक विशाल शिवलिंग भी है, जिसमें एक ही शिला पर 1008 छोटे-छोटे शिवलिंग उत्कीर्ण हैं। एक लोटा जल चढ़ाने से सभी शिवलिंग का एक साथ अभिषेक हो जाता है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई में यहां ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी तक की कई दुर्लभ मूर्तियां और कलाकृतियां मिली हैं। इससे इस स्थल की प्राचीनता और भी प्रमाणित होती है।
शारदीय नवरात्र में भद्रकाली मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। झारखंड, बिहार, बंगाल सहित देश-विदेश से श्रद्धालु माता के दर्शन और पूजन के लिए यहां पहुंचते हैं। मान्यता है कि मां भद्रकाली के दरबार से कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता। मंदिर परिसर में हर वर्ष राजकीय इटखोरी महोत्सव का भी आयोजन होता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु और पर्यटक शामिल होते हैं।

