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    Home»धर्म-समाज»कोरोना महामारी के कारण एशिया के सबसे बड़े कल्पवास मेला का नहीं हो रहा आयोजन
    धर्म-समाज

    कोरोना महामारी के कारण एशिया के सबसे बड़े कल्पवास मेला का नहीं हो रहा आयोजन

    टुडे पोस्ट लाइवBy टुडे पोस्ट लाइवOctober 29, 2020No Comments3 Mins Read
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    बेगूसराय।

    कोराना महामारी का असर सिमरिया गंगा घाट पर लगने वाले एशिया के सबसे बड़े कल्पवास मेले पर भी पड़ा है। एक महीने तक चलने वाले इस मेले की प्रशासन से आयोजन की अनुमति नहीं मिलने के कारण इन दिनों वहां सन्नाटा पसरा हुआ है। मिथिला एवं मगध के संगम स्थली गंगा धाम सिमरिया में सदियों से कार्तिक मास में कल्पवास करने की परंपरा रही है। इसमें न सिर्फ मिथिलांचल बल्कि बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और नेपाल के हजारों हजार लोग पर्ण कुटीर बनाकर कल्पवास करते थे। साथ ही 50 से अधिक खालसा भी लगाया जाता था।

    गंगा आरती और सूर्य नमस्कार से शुरू होकर कल्पवासियों की दिनचर्या  गंगा आरती के साथ समाप्त होती थी

    कल्पवास पर गंगा घाट पर सुबह गंगा आरती और सूर्य नमस्कार से शुरू होकर कल्पवासियों की दिनचर्या रात्रि में गंगा आरती के साथ समाप्त होती थी। इस दौरान कल्पवासियों के द्वारा दिनभर सात्विक और अरवा-अजवाइन भोजन करने वाले 30 दिनों तक गंगा स्नान के साथ-साथ रामायण, गीता आदि का पाठ करते  थें।  लेकिन इस बार कोरोना  संक्रमण के कारण राजकीय कल्पवास मेला नहीं लग पाया है। इसके आयोजन को लेकर साधु -संतों द्वारा काफी प्रयास किया गया मगर प्रशासनिक स्वीकृति नहीं दी गई। जिससे दूर दराज से आए साधु संतों को काफी निराशा हाथ लगी। साधु -संतों का कहना है कि भारतीय सनातन संस्कृति और अस्मिता पर प्रहार नहीं होनी चाहिए था। हालांकी परंपरा के अनुसार सिद्धाश्रम समेत विभिन्न मंदिरों में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए कार्तिक महात्म्य कथा एवं गंगा पूजन का आयोजन किया जाएगा। मेला क्षेत्र में परिक्रमा की औपचारिकताएं पूरी की जा सकती है।  सिमरिया घाट पर आदि काल से कल्पवास की परंपरा रही है। हिंदू धर्म शास्त्र में उत्तरवाहिनी गंगा का काफी महत्व है। सिमरिया में गंगा उत्तरवाहिनी है।

    राजा परीक्षित ने भी शार्प से उद्धार के लिए सिमरिया घाट पर किया था कल्पवास

    किवदंतियों के अनुसार आदि काल में राजा परीक्षित ने भी श्राप से उद्धार के लिए सिमरिया गंगा तट पर कल्पवास किया था। जनक नंदिनी सीता जब विवाह के बाद अपने ससुराल अयोध्या जा रही थी तो उनके पांव पखारने के लिए राजा जनक ने मिथिला की सीमा सिमरिया में ही डोली रखवाया था। तब राजा जनक ने सिमरिया पहुंचकर गंगा के किनारे यज्ञ और कार्तिक मास में कल्पवास किया  तभी से या कल्पवास की परंपरा चली आ रही है।  कोरोना ने तमाम इतिहास और संस्कृति को तोड़ कर रख दिया है।

     

     

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